एक दूजे के पूरक (नारी सौन्दर्य पुरुष खुद्दारी )
सौन्दर्य मैं हूँ खँडहर तो तुम हो महल की तरह, मै नीर नाले का तुम गंगाजल की तरह , मैं हूँ अतुकांत कविता जो लयहीन है तुम हो लयबद्ध सुन्दर गजल की तरह ।। खुद्दारी रूप का दर्प तुमको जो है सुंदरी, बात मेरी भी सुन लो जरा है खरी, हम न देखें जो तुमको तो फिर होगा क्या रूप की राशि रह जायेगी बस धरी ।। सौन्दर्य तुम हो कलियों की मानिंद मैं शूल हूँ , तुम हो रेशम का परदा तो मैं झूल हूँ , जिसको दिल करना चाहे हो वो कृत्य तुम, जो न दोहराई जाये मैं वो भूल हूँ । । खुद्दारी तुमको कलियाँ बताऊँ मेरी दृष्टि है, है भरा पूरा जग जो मेरी वृष्टि है, हम न देखें तो सौन्दर्य किस काम का, बस समझ जाओ हमसे ही ये सृष्टि है ।। ...