""हास्यकविता"

" लीला मंचन"                                            
आधुनिक नाटकों का  हाल मैं सुना रहा हूँ,
ध्यान देके भ्रात मेरी बात सुन लीजिए ।
राम और कृष्ण का चरित्र अति पावन था,
मंच बाले राम का चरित्र दर्श कीजिए ॥
जर्दा की पुड़िया को देके लक्ष्मण जी को,
कहते प्रभु राम भइया जल्दी इसे मीजिए। 
भैया लक्ष्मण ने जो सिगरेट सुलगाई ,
बोले हनुमान एक मुझे भी तो दीजिए॥
            २
एक दिन मैं भी रामलीला देखने को गया,
देखा दृश्य मंच का तो बुध्दि चकरा रही ।
लीला बाले मन्च पे ही पहन के न्यून वस्त्र,
नर्तकियाँ थीं अश्लील गीत गा रही ॥
पर्दे के पीछे जहाँ सज रहे थे कलाकार, 
कुछ ध्वनि वहाँ से थी बाहर को आ रही। 
मैने देखा राम जी तो जर्दा मसल रहे ,
और सीता मैया जी थीं बीड़ी सुलगा रहीं॥
            ३
बोले राम उस लड़के से जो था सीता बना,
यार एक बीड़ी हमको भी तो पिलाइए । 
बोलीं सीता बन्ड्ल में एक ही तो बीड़ी बची,
तुम्हें दी तो हम क्या पियेंगे ये बताइये ॥
सुन बात सीता जी की राम जी को लज्जा आई,
बोले सह कर्मियों से इसे समझाइये ,
यदि आगे मुझसे है काम करवाना तुम्हे,
बीड़ी वाला बन्डल तुरन्त ही मगाइए॥
          ४
तब तक नृत्य रोक घोषणा थी होने लगी,
आज बड़ी भावुक सी लीला दिखलायेंगे ।
पिता जी की आज्ञा मान लखन सीता के साथ,
प्रभु श्री राम आज बनबास जायेंगे । 
दृश्य ऐसा भावुक है सुन लो ऐ मेरे मित्र,
आप अपने आँसुओं को रोक नहीं पायेंगे।
जैसी लीला आज तक आपने  ना देखी होगी,
वैसी लीला  आज हम आपको  दिखायेंगे ॥
             ५
प्रभु श्री राम वन गमन को उद्यत हैं ,
कहती      मातु सीता संग मैं भी  नाथ जाऊँगी ।
बोले राम वहाँ कष्ट भोगने पड़ेंगे तुम्हे, 
 बोलीं जानकी जी सारे कष्ट मैं उठाऊँगी।
आप जैसा कहेंगे करूँगी वही प्राणनाथ  ,
आपके आदेश सिर माथे पे चढाऊँगी ।
आपकी मैं दासी दुःख कैसे प्रभु आप सँग,
आपके ही साथ सारा  जीवन बिताऊँगी ॥
            ६
सुन बात जानकी की राम जी को क्रोध आया.
बोले सीते अब मेरा मुँह ना  खुलाओ तुम 
जानता हूँ कितनी तुम बात मानती  हो मेरी ,
हटो मेरी नजरों से दूर चली जाओ तुम  ॥
जानती हो मैंने कोई बात तुमसे थी कही,
मुझको पता है ना ही सबको बताओ तुम ।
वन मे भी शान्ति अशान्ति ना बन जाये,
अतएव जानकी जी यहीं रह जाओ तुम ॥

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