सौन्दर्य
रक्ताभ कपोल तेरे रूपसि,झंकृत करते हैं रोम रोम ,
बिखरे सुन्दर से केशजाल मानो घन से ढक रहे व्योम |
आपस में बिंधे अधर दोनों ज्यों गुलाब की दो पंखुड़ियाँ ,
हिरनों की जिनमें चंचलता ऐसी हैं तेरी अंखडिया
काम की कमान लगे भौंहें कजरारी पलकें अति सोहें ,
काम की कमान लगे भौंहें कजरारी पलकें अति सोहें ,
आनन चन्द्र की तरह चमके जिसे देख ऋषीजन भी मोहें |
प्रस्फुटित स्वरों के होने से मन की वीणा झंकार उठे ,
जैसे बसंत के आने पर वन में कोकिला पुकार उठे
जब चलती हो कटि लहराकर नागिन को भी लज्जा आये
जब चलती हो कटि लहराकर नागिन को भी लज्जा आये
- मुझसे ना उपमा कर बैठे अतएव बिलों में छुप जाये ||
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