सौन्दर्य

रक्ताभ कपोल तेरे  रूपसि,झंकृत करते हैं रोम रोम ,
बिखरे सुन्दर से केशजाल मानो घन से ढक रहे व्योम |
आपस में बिंधे अधर दोनों  ज्यों गुलाब की दो पंखुड़ियाँ ,
हिरनों की जिनमें चंचलता ऐसी हैं तेरी अंखडिया
काम  की कमान लगे भौंहें  कजरारी पलकें अति सोहें ,
आनन चन्द्र की तरह चमके जिसे देख ऋषीजन भी मोहें |
प्रस्फुटित स्वरों के होने से मन की वीणा झंकार उठे ,
जैसे बसंत के आने पर वन में कोकिला पुकार उठे 
जब चलती हो कटि लहराकर नागिन को भी लज्जा आये 

  1. मुझसे ना उपमा कर बैठे अतएव बिलों में छुप जाये   ||

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

चाँदी जैसा रंग है तेरा का संस्कृत रूपांतरण