शारदे वन्दना
स्वरदायिनी वरदायिनी हे मातु वीणावादिनी,हे श्वेत अम्बर धारिणी
हे हंस प्रष्ठ्विहारिणी,
तू ही ज्ञान काभण्डार है तू ही देवि प्रज्ञा प्रदायिनी,
स्वरदायिनी वरदायिनी.........................
तव चरण में नत माथ हो ,मेरे शीष पर तेरा हाथ हो,
मम कण्ठ में तेरी गाथ हो,सुर ताल की स्वर स्वामिनी,
स्वरदायिनी वर.......................................
जननी ये सुत तेरा अज्ञ है मेरी मातु तू सर्वज्ञ है,
जड़ता को मेरी दूर कर ,अज्ञानता की विनाशिनी॥
स्वरदायिनी वरदायिनी हे मा्तु वीणा वादिनी ......................
अज्ञान का तम दूर कर ,विज्ञान से जग जगमगा,
कलुषित हृदय से मातु ,ईर्ष्या द्वेष मत्सर तू भगा ,
सबके हृदय पावन बने , कल्याण कर कल्यायनी ,
स्वरदायिनी वरदायिनी .................
समृद्ध अपना राष्ट्र हो, निज कर्म में रहे मन लगा,
निज देश पर बलिदान हों, ये भावना मन में जगा ।
निष्काम सेवा भाव हो , वरदान दे वरदायिनी ,
स्वरदायिनी वरदायिनी, हे मातु वीणा वादिनी ।।
" अनंतराम मिश्र"
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