कवि की साधना" [हास्य]
कंचन समान कान्तियुक्त है तेरा वदन,निज
नयन से निहार कर होवे प्रसन्न मन |
कब कैसे कहाँ किस तरह तुम मुझको मिल गईं
,
, हलचल मेरे मतवाले मगन
मन में मच गयी |
जन्नत की कोई हूर अप्सरा हो या स्वपन ,
जब जैसे जहाँ देखूँ लगे तू
मुझे नयी |
उसके ह्रदय में क्या है नहीं जानता हूँ
मैं ,
पर उसको अपनी जाने वफ़ा
मानता हूँ मै |
एक रोज उससे प्यार में कुछ ऐसा कह गया ,
उस रोज से खुद को नहीं
पहचानता हूँ मै |
एक दिन मैं उससे बोला सुनो ऐ मेरे हमदम ,
मै कवि हूँ और तुम ही हो
कविता मेरी जानम .|
तुम कल्पना तुम साधना तुम भावना मेरी ,
[तो वो बोली]
तुम ही मेरे दिनेश महेश सुरेश हो
सनम ||
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