नववर्ष की हार्दिक बधाई [हास्य कविता]
नववर्ष की
हार्दिक बधाई
३१ दिसम्बर २००९ साल
का अंतिम दिवस था ,मैं सजधज कर दिन की ड्यूटी कर रात्रि की ड्यूटी के लिए विवश था
,हमारी फर्म का जो जीयम था,
उसका बनाया हुआ
कुछ ऐसा नियम था ,महीने के अंतिम दिन 24 घंटा ड्यूटी जरूरी थी इस लिए साब ड्यूटी
करना मेरी मजबूरी थी ,लेकिन आज
दिल में नहीं कोई
मलाल था ,क्योंकि आने वाला नया साल था |
शाम आठ बजे डिनर
के लिए बाहर आया मोबाईल में रिचार्ज 333 का करबाया एयरटेल का सिम था बैलेंस पूरा
आया ,अपनी ही मस्ती में नम्बर
चेक करता आ रहा था
कितनी गर्लफ्रेंड हैं गिनता जा रहा था ,फोनबुक का
फंक्सन पूरा मझाया
दो के अलावा तीसरी का नम्बर नहीं आया ,एक नम्बर
मेरी घरवाली का था
और दूसरा उसका जिसने था कभी मुझको पटाया ,
वो यदा कदा मिसकाल
मार देती थी ,पैसे मेरे कटते थे पर फोन पे ही
सही मुझे भरपूर
प्यार देती थी ,सोच लिया घरवाली को तो सुबह बधाई
दूँगा पर बाहर
वाली को रात १२ बजे से सुबह तक न सोने दूँगा , तभी
मोबाइल की रिंग
घनघनाई तब मुझे चेतना आई,ख्वाबों से निकल कर
हकीकत के धरातल पर
आया फोन के मिस्काल देखने बाले बटन को दबाया,
दिल धड़क गया हाथों
में कम्पन आया ,तुरन्त मिश्काल को वापस घुमाया,
मधु से मीठा पानी
से पतला गुलाब जैसा कोमल स्वर कानों से टकराया ,
आइ लव यू जानू
अपने दिल का दर्द कहाँ तक बखानूं दिल हरपल आपके
लिए बेकरार है
क्या इसी का नाम प्यार है ,मैं बोला जानूँ मैं कैसे मानू ये
तो आपका रोज का
इकरार है कुछ नया सुनाया करो पुराना प्यार तो सदियों
से स्वीकार है
,अभी मुझे कुछ बहुत जरूरी काम है रात को तैयार रहना दिल
करने को बेकरार है
,वो बोली धत ,मैनें कहा बदल ले अपनी सोच तूने नहीं जान पाया मैं हूँ कौन अरे कुछ
नहीं पागल ,नववर्ष की खातिर रात बारह बजे करूँगा फोन , कैंटीन में भी आज रात
धमाचौकड़ी मची थी , क्योंकि
नया साल आने में
कुछ घड़ियाँ ही शेष बची थीं, मेरे लिए आया तब नया
जंजाल बैठा था
शुकून से तभी प्रोडक्शन डालने को आ गया नया माल ,
मैनें फटाफट
कंप्यूटर के कीपैड को दबाया ,एक घंटे का काम आज
पहली बार बीस मिनट
में निपटाया ,तब तक कैंटीन में मचा जोर का
बवाल अरे कुछ नहीं
आ गया था नया साल ,कुछ लोग तो नया साल
ऐसे मना रहे थे
मनो पुत्र जन्म की खुशखबरी लेकर आ रहे थे ,चारों ओर
फोन की घंटियाँ
घनघना रहीं थीं ,हर तरफ से नववर्ष की शुभकामनाएँ आ
रहीं थीं ,मेरा
मोबाईल मानों नींद के आगोश में था जबकि सारा माहौल बड़े
उल्लास और जोश में
था ,सारे दोस्तों की गर्लफ्रेंडों के
सन्देश और कॉल आ
रही थी, मेरी वाली
न जाने किसके साथ नया साल मना रही थी, आँखें लगातार मोबाईल स्क्रीन पर जमी थीं
नब्ज तो चल रही थी साँसे मनो थमी थी ,मिशकाल के इंतजार में घड़ियाँ ऐसे कट रहीं थी
पत्थरों से जैसे लकीरें
मिट रही थीं
,दोस्त भी अपने अपने आफिसों में जाने लगे कुछ गाने कुछ गुनगुनाने लगे ,और कुछ खास
दोस्त मुझे इस तरह चिढाने लगे ,एक बोला
मेरी बात माना कर
यार एक से कुछ नहीं होता कम से कम चार से करना
था प्यार तेर
मोबाईल की नींद कब की भाग ली होती अगर दो चार लडकी
तूने पटा ली होतीं
,मैनें कहा एक के लिए इतना हूँ परेशान दो चार होतीं तो अब तक निकल गई होती मेरी
जान ,मुझको अब गुस्सा आ रहा था ,जबकि
सारा देश नया साल
मना रहा था ,आवेश में अपनी तरफ से ही फोन लगाया घंटी बजी कानों में दिल को कुछ शुकून
आया ,कुछ पल पश्चात कम्प्यूटर का स्वर कानों से टकराया आपका डायल नम्बर किसी ने
नहीं उठाया ,गुस्से में आकर दुबारा रीडायल का बटन दबाया अबकी सारा ब्रम्हांड हिलता
नजर आया क्योंकि फोन उसने नहीं उसके पिता जी ने उठाया बुड्ढा खूसट जोर से गुर्राया
,रात को एक बजे तूने फोन किस लिए लगाया रात को लोफरटी करते तुझे शर्म नहीं आई
,मैनें बड़े शांत स्वर में कहा अंकल आपको नववर्ष
की हार्दिक बधाई
,आपको नववर्ष की हार्दिक बधाई ||
अनन्तराम मिश्र

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