वैलेंटाईन डे
14 फरवरी की सुहानी सुबह,
भगवान भास्कर
ने अपनी स्वर्णिम रश्मियों से ,
संसार को जगमगाया ,
संता ने मोबाईल ऑन किया ,
स्क्रीन
पर एक एस एम् एस आया ,
36 रुपये के रिचार्ज पर ,
लोकल एस टी डी 480
मैसेज 28 दिन के लिए पाओ ,
बिना किसी अतिरिक्त चार्ज के वैलेंटाइन
डे मनाओ ,
संता को तो वेलेंटाइन डे का
बिल्कुल नहीं खयाल था ,
याद दिला दिया मोबाईल ने ,
दिल में मच गया बवाल था ,
सोचा आज किसी ना किसी से
अपने दिल का हाल
कह डालूँगा ,
इस प्यार भरे दिन पर मैं भी कोई नया
दोस्त पा लूँगा ,
निकल पड़ा घर से अपने
हृदय में लेकर एक आस ,
आज उसे थी नए
दोस्त की तलाश , सड़को पर बाजारों में,
गाँवों के गलियारों में हर जगह मझाया ,
जिन
नयनों में प्यार हो ऐसी नजर वाला ,
कहीं नजर नहीं आया , कुछ पल पश्चात बस
स्टॉप पर आया ,
अपनी दृष्टि को चारोंओर घुमाया वहां भीड़ की थी भरमार ,
किन्तु
कोने की बेन्च पर अकेली सुन्दर सी कन्या
कर रही थी बस का इन्तजार उसने मन में
सोचा ,
अब बिलकुल नहीं देर लगाऊंगा ,
इस स्मार्ट लड़की को ही पटाउँगा ,
उसने एक नजर
लड़की के चेहरे पर डाली
आँखों सेआँखें टकराईं
उसे लगा उसने अपनी मंजिल पाली ,
जब संता ने उसकी ओर प्यार से निहारा, उसने भी करीब आने का किया इशारा, पास बुलाकर पूछा -
ऐसे क्या देख रहे हो ?
बड़े ढीठ हो जो दूर खड़े होकर ,
अपनी आँखें सेंक रहे हो ,
उसकी बात सुनकर वह थोडा लजाया ,
और कुछ शर्माया,
मगर तभी उसके नादाँ दिल ने समझाया ,
तू क्यों घबरा रहा है , लडकी दोस्ती करने
को तैयार है ,
फिर तू क्यों इतना शर्मसार है ,
उसकी सारी हया लज्जा जाती रही ,
क्योंकि
वो अनवरत उसे देख मुस्कुराती रही ,
पास जाकर संता ने
थाम लिया उसका हाथ ,
और
बोला हैप्पी वैलेंटाइन डे ,
आई लव यू ,
मुझे चाहिए आपका
जीवन भर के लिए साथ वो
शर्माई सकुचाई लजाई ,
और जल्दीसे उसके हाथों से अपनी कलाई छुडाई ,
उसके
चेहरे के भाव वह नहीं पढ़ पाया,
वो घनचक्कर
उसके कुछ ज्यादा ही करीब आया ,
क्योंकि उसकी हँसी ने
उस मजनूँ की आत्मा डसी थी ,
लड़की हँसी तो फँसी ,
बस यही बात दिल में
बसी थी उसने प्यार से उसकी ओर निहारकर,
अपने मोबाईल को कान से सटाया,
और धीरे से कुछ फुसफुसाया ,
मगर संता मस्ती में
कुछ भी नहीं समझ पाया ,
परंतु कुछ क्षण पश्चात , सारी बात समझ में आई,
जब कुछ मुस्टंडों ने दी उसे
वैलेंटाइन डे की बधाई ,
लडकी बोली इनसे
मिलिए जनाब ये चारों हैं मेरे भाई ,
उन्हें देखते ही वह समझ गया अब तो मेरी शामत
आई ,
उन चारों ने मिलकर पहले खूब की ठुकाई
सिर को मुड़वाकर शान से गधे
पर बिठाया जूतों का हार गले में पहनाया ,
सारे शहर में हर गली हर कूंचे में घुमाया
, लोगों ने पूछा मिस्टर आशिक,
आशिकी समझ में आई तब संता ने लोगों को ये बात
समझाई >>>
अपनी संस्कृति
अपनी सभ्यता के,
त्योहारों को छोड़कर,
विदेशी ऊल जुलूल त्यौहारों को मनाएंगे,
तो मेरी तरह आप भी,
लात घूंसे जूते चप्पल सब खायेंगे ||
मनानी है तो महापुरुषों की जयंती मनाओ,
उनके पग चिन्हों पर खुद भी चलो ,और अपने बालकों को भी चलना सिखाओ,
विदेशी संस्कृति के वशीभूत,
यदि ज्यादा हो जाओगे,
स्वयं के अस्तित्व को भी
पहचान नहीं पाओगे ।
अनन्तराम मिश्र

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