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पाछिलि होली

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                        पाछिलि होली चहुँ  ओर अबीर गुलाल उडे, समवेत ह्वे फागु को गायि रहे , परदेश मा जो जन वास करैं, सो सब निज निज गृह आई रहे | जब से याहू फागुन मास लगो , सब अति आनन्द मनाई रहे , पर यहु सब तो है अतीत भयो ,हम पाछिलि बात बताई रहे |  | ना वो गोपी रहीं नावो कान्हा रहे ,ना हिय में प्रेम पवित्र रहो , हिरदय में वासना वास करे , यहु  प्रेम को रूप न जाति  सहो | चहुँ ओर समाज कलंकित है , केहु को ना केहू पे विश्वास रहो , अब शक्कर खोया तेज भयो , ना वो होली रही ना वो फागु रहो ||                       अनन्तराम मिश्र