पाछिलि होली

                      पाछिलि होली
चहुँ  ओर अबीर गुलाल उडे, समवेत ह्वे फागु को गायि रहे ,
परदेश मा जो जन वास करैं, सो सब निज निज गृह आई रहे |
जब से याहू फागुन मास लगो , सब अति आनन्द मनाई रहे ,
पर यहु सब तो है अतीत भयो ,हम पाछिलि बात बताई रहे |
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ना वो गोपी रहीं नावो कान्हा रहे ,ना हिय में प्रेम पवित्र रहो ,
हिरदय में वासना वास करे , यहु  प्रेम को रूप न जाति  सहो |
चहुँ ओर समाज कलंकित है , केहु को ना केहू पे विश्वास रहो ,
अब शक्कर खोया तेज भयो , ना वो होली रही ना वो फागु रहो ||

                      अनन्तराम मिश्र

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