मुक्तक
फुटकर छं द
जिसके दीदार को आँखें हमारी तरसी हैं ,
याद कर जिसको शबे सहर में ये बरसी हैं |
एक झलक उसकी दिखे बस इसी ख्वाहिश को लिए ,
भटकती फिर रही कैसी ये दर -बदर सी हैं ||
2
सबके चेहरे में उसका चेहरा नजर आता है ,
उसकी चाहत के सिवा और कुछ ना भाता है |
जब भी तन्हाइयों में याद उसे करता हूँ ,
दिल मेरा उसको अपने आस -पास पाता है ।
3
तेरी नजरों की बेरुखी भी है कबूल मुझे ,
जरा भी गम ना करूँ तू जो जाये भूल मुझे |
मैंने अपनी किताब में सम्भाल रक्खा है,
जो तुमने प्यार से पहला दिया था फूल मुझे ||
4
एक मुद्दत के बाद उसका जो दीदार हुआ ,
प्यार से भी कहीं ज्यादा था उनसे प्यार हुआ |
उसने कुछ ऐसी बेरुखी से निहारा मुझको ,
वर्षों का सपना जो दिल में था तार तार हुआ ||
5
जहाँ झरना झरे पर्वत के नीचे झील होती है ,
बिगड़ जाते हैं वे बच्चे की जिनपर ढील होती है ।
जो बोलो बात कोई भी हमेशा तौलकर बोलो ,
ना जाने कौन सी बातें किसी क्या फील होती हैं ॥
अनन्तराम मिश्र
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