बुढ़ापे का विवाह
जब वर्ष पचास के हुइय गयनु ,
तब हमरेउ देखनौया आये
मुलु बहुतन का लौटार दिहिन
जब नीक आदमी नहीं पाए ।
आखिर का एक दुबे पण्डित
उई आई अड़ंगा डार दिहिन।
हमरी शादी बरजोरी से,
वोइ जल्दी ठीक कराइ दिहिन।
हमरे नजदीक आइ करिके ,
तब दुबे कही सुनु लेउ भैया ।
रुपया नौ सौ लड़की वाले ,
मागति हईं तुम दै देऊ भैया।
हम कही दुबे तुम जाऊ घरै ,
हम ब्याहु अइस करिवा नाहीं।
मरि चाहे जाइ कुँवारे ही,
पई कौड़ी एक देवो नाहीँ।
फिर लगे कहन पण्डित,
हमका लागति हइ तुम सठियाई गए ।
दरवाजे पर आवा वियाहु,
तेहि पर तुम मूडु हलाई गये।
रुपया पैसा सुख की खातिर,
अपने ही सभी कामावत हईं।
जब जियतइ भोगिवे नरक मिलै
फिरि कौन काम बहु आवति हइ।
हम द्याखत रोज यहै तुमका ,
पानी लौ कोई देवैया ना ।
बाहेर भीतर सब भरो परो ,
पै कोई उसै भोगैया ना ।
तेहिते अब व्याहु करऊ दइके,
सुखु भोगि लेउ चलती बेरिया ।
सोरह की मिलिहै बहू तुमई,
गहि मारउ हाथु अरे भैया ।
हमनेउ अपने मन मै स्वाचा,
हई दुबे सत्य बतलाइ रहे ।
नहीं हमरो कोई दोसरिहा हइ
तेहिते तरकीब बताइ रहे ।
यहु सोचि कही पण्डित तुम्हरी
बातन ते उजुकु हमई नाहीं ।
लेकिन सम्पूरन रुपया तौ,
पहिले तौ हम देवो नाहीँ ।
जब विदा कराइ घरै लौटें,
तब सब रुपया गिनबाई लिहौ।
तुम तऊ हऊ दुबे हितू हमरे,
चाहे सो चीज रखाई लिहउ ।
आखिर का व्याहु ठीक हुइगा,
अखतीज की लगन धराई गई ।
सोने को जेबर सबु लइहउ ,
यह पहिलेइ बात बताई गई।
हम किहिन पालकी और बाजा,
आतिशबाजी बढ़िया बढ़िया ।
मुल्लनि मखतुब्बनि ठीक करीं ,
जो थी बढिके चकला महियाँ।
जब दुइ दिन रहे बरायत के,
तब हमरिउ काया पलटि गई ।
दाढ़ी और मूँछ मुड़ाइ दिहिनि ,
भौहन के ऊपर वाढि धरिन।
देही मा रोआँ तक नाहीं रखा,
हमने घोटवाई दिहिन ।
उबटन करबाइ के दुइ बख्ता,
देहिया चिकनी कारबाई लिहिन ।
आँखिन मा सुरमा खूब जड़ा ,
औ जामा नीमा पहिर लिया।
कर मा कंगना सिर पर मौरा,
पायन मा जूता डार लिहिन ।
सजि गई बरायत जब सिगरी ,
हमहुँ पलकी मा बैठ गयनु ।
ज्यादा बकबास का काम नहीं ,
संझलौखें हम सब पहुँच गयनु।
जब आध मील पर गाँव रहा ,
तब दुबे कही अब रुकि जाबौ,
पाछे जह अभइ बरायत है ,
चलिहौ तब जब सब आ जाबै।
तब लौ बाजा बालेंन ने,
अपनी कंडाल बजाई दिहिन ।
और ग्वाला एक रबाइस वाले,
ने दनाक से दाग दिहिन ।
परि गई खलबली घर घर मा,
शुकुलन घर आई बरायत हई ।
कछु घरी क्यार अरसा महियाँ ,
हमनेउ दयाखा कोइ आवति हइ।
उइ पलकी तीर आई करिके ,
झुकि झुकि के हमई लगे द्याखन ।
जब द्याख भारि के आपस में
हँसि हँसि के लागे यूँ भाषन
लरिकवा कि उम्मरि देखउ तौ
ढूंढें से ना कारो बारु मिलै
मुँह प्यापलु याकउ दांत नहीं
ऐसा दुलहा कहुँ नाहि मिले,
हमनेउ उनकी यह बात सुनी
सब वदन एकदम पजरि गवा,
गुस्सा लागी बहुतक हमका
जिन दुबे ने ऐसो व्याहु रचा,
इतने मा हमरो एकु सारो
आवा और कहिसि बरात चलै
जब चली बरायत हई सगरी
हमहूँ अपने दिल खुशी भयन ,
मरघट वाली बगिया महियाँ
सगरी बरात टिकबाई दई ,
तब लौ हुई सांझी बेरू गवा
मुलु हमई रतौंधी आई गई,
हम द्याखैं आँखी फारि फारि
पर सूझि परै कछु नहि हमका,
चौतरफा तितुली सी नाचै
बस याहै दिखलाबै हमका,
एकु दयाराम नौआ आवा
उइ कहिसि चलौ द्वाराचारै
सुनि हमरौ दिल थर्रान लगा
विपदा कटिहै अब कर्तारै ,
जब पलकी पहुंची द्वारे पर
सगरी मेहरिया लगीं झांकन,
उइ गैस ने काम बनाई लिहिन
कोई परखि सकै नाही हमका ,
लइ लीन्ह दुबे गोदी जल्दी
पहुंचाई दिहिनि मडये हमका,
नेगा जोगा जब हुइय गवा
औ भौरिन की वारी आई ,
आवति है हमई रतौंधी तब
चुपके से दुबे का बतलाईन ,
तब कहां दुबे ने ओ भैया
हमरे कुल की यह रीती है,
लरिका की बांह पकरि भौरी ,
डरबाबौ यह परतीती है,
तब याक नौअबा ने हमका ,
उठाई कर खड़ा किहिन,
मडये मा मूड ठसाक भवा,
हम बहुतक ही बिल्लाई गयनु,
छे भौरीं जब घूमि गयनु ,
औ सतईं की बारी आई,
तब उहि नालायक नौआ ने,
दई छांड़ि बाँह हमरी भाई,
यकु हवन कुण्ड माँ पाऊँ पड़ा,
हम कूदि परे एकदम भइया,
सबु पाऊँ हमारा जरिअ गवा,
मुलु करै लगे दैया मैया ,
मडये मा बकन झकन लागे,
छांड़ी हम याकऊ बात नहीं ,
तब लौ मुँह मा पाँखी भरि गईं,
हम थूकि दिहिन नौआ परिहां,
नौआ बोला का अंधरे हउ
हम कहिंन अपन बदला लीन्हा,
दुसरे दिन भातु खाई करिके ,
फिर चलई लगे द्वारे परिहां ,
कुइयां एक रहई दुवारे पर,
गिरि गए ठेस खाई उहिमा,
ऊपर से गिरे दुबे भइया,
उन्हहू का कुछु सूझा नाहीं,
तब लौ कोई चिल्लाई उठा,
कुइयां मा गिरि गया है कोई ,
कुछ द्यार बाद हम दोनों का,
बाहर निकारि पूछा सोई ,
का आवति तुम्हइ रतौंधी हइ,
दोनौं का जो तुम जाइ गिरे ,
हम कहिन कि बोलौ मुँह संभारि,
का अंधरे जे हम जाइ गिरे ,
पर दुवे कही जह चार भरी ,
हम बोले आठ हाथ पानी ,
बस यहै बात के कारण से,
हम दोनौं मा भई ऐंचा तानी ,
हम घुसेन और नापन लागे,
तब दुवे कहिन मनिवा नाहीं,
हमरे आगे अब नापौ तौ,
यहु कहि घुसि आये कुआँ माही,
अब इनहे परिहा पूछि लेउ ,
कुइयाँ मा आठ हाथ पानी,
बेकार मा किन्हीं मुँहचावरि,
अब काहे बात हमरी मानी,
तिसरे दिन चले कलेवा खैवे का,
कछु मुलु अंधियारे। मा,
लेकिन पापिनी रतौंधी के,
मारे ना लखै उजियारे मा,
जब पहुँचि गयन घर के भीतर
तब पत्तल समुहे का आई ,
तब याक बिलइया रबड़ी मा
मुँह डारि दिहिसि जल्दी भाई,
तब बोली एक मेहरिया वह
रबड़ी मा खाति बिलइया हइ,
हम कहिन खबावत साथ साथ
घरहू मा एक बिलइया हइ ,
अब याक कटोरा मा रबड़ी,
लावउ औ धरौ आइ हमका ,
जब आई कटोरा गओ समुहे
अउ सरहज ने शक्कर डारी ,
हम समुझे वहै बिलइया हइ,
पटुली उठाइ के दुइ मारीं ,
मचिगवा स्वार गुल घर भीतर ,
बुढउ जी रतौंधी मा भागे,
अब तौ सबने पहचान लओ
बुढऊ जी रतौंधी मा पागे ,
तेहिते तुमका समुझावति हैं,
मत चौथेपन करिहौ शादी ,
धनबल अउ इज्जत खोई खाई
आखिर का हुईहै बरबादी ,
ब्रम्हानंद की इन बातन पर
जो ध्यान धरैं भारतवासी,
सुख से तौ जीवन कटै और
सब दुःखन की होवै नासी ,
" ब्रम्हानंद सरस्वती कोठिला"
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें