झूठा इनकार

    शेर -
लाख करो इंकार मगर
             सच्चाई को झुठला न सकोगे
प्यार तुम्हें मुझसे है हमदम
             मुझ को कभी भुला ना सकोगे

           गीत -
सुर्ख होठों से इंकार करते हो तुम
         आंखों में प्यार फिर क्यों बसा रक्खा है ,
गर  नहीं है जगह दिल में मेरे लिए
                     तुमने अपना मुझे क्यों बना रक्खा है ।।

सुर्ख होठों से इनकार.......

दिल की बातें तो दिल में छुपाते रहे
            फिर भी नजरें हमीं से मिलाते रहे,
तेरे कजरारे नैनों ने ऐ जानेमन
             मुझको दीवाना फिर क्यों बना रक्खा है ।
 
सुर्ख होठों से इनकार करते हो....
    आँखों में प्यार.........

इतने लगते हो प्यारे खुदा की कसम
         रखते होठों पे जब उंगलियों को सनम
उस दुपट्टे की किस्मत से होती जलन
       जिसको सीने से तुम ने लगा रक्खा है ।।

सुर्ख होठों से इनकार करते हो तुम
          आंखों में प्यार फिर क्यों बसा रक्खा है
गर नहीं है जगह दिल में मेरे लिए
            तुमने अपना मुझे क्यों बना रक्खा है ।।

सब से नजरें बचाकर तेरा देखना
            मुझको कर देगा बदनाम ऐ जाने जाँ
अपनी नजरों से कह दो ना देखें मुझे
                 इस तरह देखने में भी क्या रक्खा है ।।

सुर्ख होठों से इनकार करते हो तुम
          आंखों में प्यार फिर क्यों बसा रक्खा है,
गर नहीं है जगह .............तुमने अपना मुझे ......

रात में चांदनी गुलों में हो गुलाब
               ये तेरा हुश्न है जानेमन पुर शबाब,
तुम हमेशा महकती चहकती रहो
                  इस दुआ को लवों पर सजा रक्खा है

सुर्ख होठों से इनकार करते हो तुम
          आंखों में प्यार फिर क्यों बसा रक्खा है
गर नहीं है जगह दिल में मेरे लिए
                  तुमने अपना मुझे क्यों बना रक्खा ।।

      

  

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