आहिस्ता आहिस्ता
एक छोटी सी रचना-
वो आँखों के रस्ते थे जब दिल मे उतरे ,
जुड़ा उनसे कैसा ये बेनाम रिश्ता ।
किसी के लिए वो तो एक शख्स होगा ,
मगर मुझको लगता था जैसे फरिश्ता।
भुला बैठता था मैं ग़म सारे अपने,
वो नूरानी चेहरा था, जब जब भी हँसता।
ज़माने की बंदिश से मजबूर होकर,
हुए दूर थे हम आहिस्ता आहिस्ता।।
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