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मई, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

नवीन संस्कृति

आज अपनी संस्कृति का पतन होता जा रहा , हर तरफ पर संस्कृति का नशा छाता   जा रहा | है यही वह देश प्यारे विश्व का जो था गुरु   , अपनी गरिमा को ये धीरे धीरे खोता जा रहा माँ बाप के सम्मान   सूचक शब्द भी अब खो गए , माता बनी मम्मी पिता जी डैड कैसे हो गए | आशीष पाते थे बड़ों के पैर छूकर के जहाँ , टाटा हल्लो और हाय में हम आज कैसे खो गए || हम आधुनिक बनने की खातिर क्या न करते फिर रहे , अच्छे भले कपड़ों में भी पैवंद कैसे जड़ रहे | सोचा   न था फैशनपरस्ती ऐसे दिन दिखलाएगी , रूमाल भर कपड़े से ही औरत पूरी ढक जायेगी || नारी का आभूषण है लज्जा बात थी प्रचलित यहाँ , पर फैशनों के दौर में है नारियाँ विचलित यहाँ | सबसे अलग मैं ही दिखूं ये होड़ इनमें लग रही , अतएव लज्जा सो गयी निर्लज्जता है जग रही ||                         अनन्तराम मिश्र   एम.ए . बी . एड .

मुक्तक

फुटकर छं द जिसके दीदार को आँखें हमारी तरसी हैं   , याद कर जिसको शबे सहर में ये बरसी हैं | एक झलक उसकी दिखे बस इसी ख्वाहिश को लिए , भटकती फिर रही कैसी ये दर -बदर सी हैं ||                                      2 सबके चेहरे में उसका चेहरा नजर आता है , उसकी चाहत के सिवा और कुछ ना भाता है | जब भी तन्हाइयों में याद उसे करता हूँ , दिल मेरा उसको अपने आस -पास पाता है ।                      3 तेरी नजरों की बेरुखी भी है कबूल मुझे , जरा भी गम ना   करूँ तू जो जाये भूल मुझे | मैंने अपनी किताब में सम्भाल रक्खा है , जो तुमने प्यार से पहला दिया था फूल मुझे ||                4 एक मुद्दत के बाद उसका  ...

कृष्ण को बुलावा

                         द्रोपदी की पुकार तर्ज   > प्यार झूठा सही दुनिया को ................... आज विपदा पड़ी मुझपे तू मिटाने आजा ,ऐ मेरे श्याम मेरी लाज बचाने आजा | आजा आजा आजा आजा ...................... पती पाँचों हैं मेरे बैठे मुझे हारे हुए ,सभा के बीच में सर अपना नीचे डारे हुए , इनमें इतनी नहीं हिम्मत ये बचा ले मुझको ,होके मजबूर तेरी बहना पुकारे तुझको | तू है असहायों का ये सबको दिखाने आजा ,ऐ मेरे श्याम मेरी लाज बचाने आजा || १|| खलों के बीच अकेली मै फंसी हूँ मोहन , कर रहा लाज से खिलबाड आज दुर्योधन , कहीं ऐसा ना हो कि मेरी लाज लुट जाए ,तेरी बहना का शर्म से ही सर न झुक जाए | सभा में जा रही इज्जत को बचाने आजा , ऐ मेरे श्याम मेरी लाज बचाने आजा   ||२|| पुकार इस तरह जैसे ही सुनी द्रोपदि की , दौड़कर आये नहीं देर जरा सी भी की | बढाया चीर है द्रोपदि का आज मोहन ने ,बचाई लाज एक अबला की मनमोहन ने | पुकारे भक्त सभी दर्श दिखाने आजा , ऐ मेरे ...