नवीन संस्कृति
आज अपनी संस्कृति का पतन होता जा रहा , हर तरफ पर संस्कृति का नशा छाता जा रहा | है यही वह देश प्यारे विश्व का जो था गुरु , अपनी गरिमा को ये धीरे धीरे खोता जा रहा माँ बाप के सम्मान सूचक शब्द भी अब खो गए , माता बनी मम्मी पिता जी डैड कैसे हो गए | आशीष पाते थे बड़ों के पैर छूकर के जहाँ , टाटा हल्लो और हाय में हम आज कैसे खो गए || हम आधुनिक बनने की खातिर क्या न करते फिर रहे , अच्छे भले कपड़ों में भी पैवंद कैसे जड़ रहे | सोचा न था फैशनपरस्ती ऐसे दिन दिखलाएगी , रूमाल भर कपड़े से ही औरत पूरी ढक जायेगी || नारी का आभूषण है लज्जा बात थी प्रचलित यहाँ , पर फैशनों के दौर में है नारियाँ विचलित यहाँ | सबसे अलग मैं ही दिखूं ये होड़ इनमें लग रही , अतएव लज्जा सो गयी निर्लज्जता है जग रही || अनन्तराम मिश्र एम.ए . बी . एड .