बड़े का दर्द
" किसी के हिस्से में मकाँ आया , किसी के हिस्से में दुकाँ आयी , मैं घर में सबसे छोटा था , मेरे हिस्से में माँ आयी, एक मशहूर शायर की इन पंक्तियों ने , कविता प्रेमियों की बहुत वाह वाही पायी, पर मुझ नाचीज को ,एक बात समझ में नही आयी , अपनी अपनी तारीफ करना बात, सदियों पुरानी है , मगर घर में छोटा होना ही क्या श्रवण कुमार की निशानी है, बड़े को लोभी ,लालची आपने ठहराया है, पर बड़े के बड़प्पन को कौन समझ पाया है , पहले छोटों को खिलाकर तब स्वयम खाता है, छोटों के नाज नखरे बड़ा ही उठाता है, हमें तो कभी -कभी दूर से ही दुत्कार दिया जाता था, सारा प्यार तो छोटे पर ही निसार किया जाता था , बड़ा जिम्मेदारियों का पहाड़ उठाता है , ऐसे में छोटा सिर्फ मौज मस्ती मनाता है...