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अक्टूबर, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सत्य घटना दूध पीने वाला भूत

एक दिन मेरे मित्र जितेन्द्र सिंह ने मुझसे एक प्रश्न किया , यार सच बताओ क्या भूत वास्तव में होते हैं या ये सिर्फ लोगों का वहम है | मैनें पूछा तुम्हारी क्या राय है तुम, क्या मानते हो ,उसने बताया बैसे मैंने आज तक कोई भूत बूत कुछ नही देखा मगर लोंगों से सुना है और एक बात सच बताऊँ मैं डरता भी बहुत हूँ पता नहीं क्यों | ये सच है कभी कभी हम सुनी सुनाई बातों पर भरोसा कर लेते हैं तथा किसी बात की गहराई में जाये बगैर विश्वास कर लेते हैं हमारा वही विश्वास अन्धविश्वास कहलाता है ,और समाज में कुछ प्राणी ऐसे भी होते हैं जो ऐसी बातों में खूब नमक मिर्च लगाकर दूसरों को  सुनाते हैं वे बातें हमारे मन में कुछ इस तरह समां जाती हैं कि भुलाये नहीं भूलतीं वही हाल मेरे दोस्त का भी है , मैनें हँसकर कहा यार कहने को सिंह हो मगर रात में लघुशंका के लिए भी बिना पत्नी को साथ लिए नहीं जाते ,उसने मुझसे कहा यार क्या करूँ कोई उपाय बताओ जिससे रात को बाहर जाने में डर ना लगे मैंने कहा यार मैं तुम्हे अपनी आप बीती सुनाता हूँ शायद  उसे सुनकर कुछ हद तक तुम्हारा डर कम हो जाये >>>>> बात सन २०१० क...

याद रहेगा

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प्यार हमारा तुमको जाना ,याद हमेशा आयेगा | तेरी आँखों की झीलों में अक्स मेरा लहराएगा || प्यार हमारा ........................................ जब जब याद करोगे हमदम ,वो बीती सारी बातें , कैसे कैसे दिन कटते थे कैसे गुजरती थीं रातें , साथ में गुजरा एक एक लम्हा दिल तो भुला ना पायेगा | प्यार हमारा तुमको जाना .................................. तेरी आँखों की झीलों .......................................... आज भी मुझको याद है तेरा हाथ पकड़ कर बिठलाना , कहना वो तेरा मेरी खातिर कुछ पल तो ठहरो जाना , इतना जिसको प्यार मिले वो दूर भला क्या जायेगा | प्यार हमारा .............. तेरी आँखों ............................ मत सोचो क्या पाया हमने और हमें क्या खोना है , शाश्वत प्रेम रहे बस दिल में होने दो जो होना है , प्यार अमर है इस दुनिया में इसको कौन मिटाएगा | प्यार हमारा तुमको ............... तेरी आँखों ....................... ऐसा प्यार है तेरा मेरा जिसकी न कोई मंजिल है , फिर भी न जाने तेरी खातिर क्यों धड़के मेरा दिल है , तुझमें मुझको रब दिखता है दिल तुझे पूजना चाहेगा ||...

"तो क्या करें "

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हमने अपने गुरुदेव श्री विमल शुक्ला जी  के ब्लॉग पर एक लेख पढ़ा “ बदल गया स्कूल आज के हालत पर एकदम सटीक है गुरू और चेलों का सम्बन्ध सिर्फ अपना अपना उल्लू सीधा करने तक रह गया है ये बात बिल्कुल सत्य है परन्तु उस लेख के छंद की  अंतिम पंक्ति जिसमें टियुशन बाले गुरुओं के लिए कहा गया है “ विद्यालय को छोड़ क्लास टियुशन की लेता ; इस पंक्ति पर कुछ कहना चाहूँगा >>>>    टियुशन जो गुरु ना करे तो भूखों मरि जाये,                          प्राइवेटन स्कूल मा मिलत कितनी तनुखाह | मिलत कितनी तनुखाह खर्च को कैसे चलावें ,                       जो ना टियुशन करे कर्ज सिर पर चढि जावे | भला करे भगवान सभी सरकारी गुरु का                      ...

कवि की साधना" [हास्य]

कंचन समान कान्तियुक्त है तेरा वदन,निज नयन से निहार कर होवे प्रसन्न मन | दिन भर की थकन सारी ये शरीर त्याग दे ,क्षण भर को अगर देख लें मुझको तेरे नयन कब कैसे कहाँ किस तरह तुम मुझको मिल गईं ,                         , हलचल मेरे मतवाले मगन मन में मच गयी | जन्नत की कोई हूर अप्सरा हो या स्वपन ,                       जब जैसे जहाँ देखूँ लगे तू मुझे नयी | उसके ह्रदय में क्या है नहीं जानता हूँ मैं ,                      पर उसको अपनी जाने वफ़ा मानता हूँ मै | एक रोज उससे प्यार में कुछ ऐसा कह गया ,                    उस रोज से खुद को नहीं पहचानता हूँ मै | एक दिन मैं उससे बोला ...

राष्ट्रीय भोजपुरी गीत

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भोजपुरी गीत राष्ट्रीय दुनिया का देखी हमने ,दुनिया का देखी हमने,  कहीं न जनाला आपन देशवा सारे  जग से निराला ,आपन देशवा सारे जग से निराला | रउआ का बताई आपन देशवा की बतिया ,कइयो देश कइयो बार किन्ही आई घतिया, अपना न सोची अउरन का नोची २ ऐसे बैरिन का देखो जड़ से मिटाला | आपन देशवा सारे  जग से निराला .................................... उत्तर में हिमगिरि अहिकन शोभा बढावेला ,दक्षिण पैर  पखारन सागर लहरावेला | गंगा की धारा जमुना की धारा २ गंगा की धारा सारे जग को ताराला | आपन देशवा सारे जग से निराला ,आपन ........................................ ऐसन है पावन आपन ई जन्मभूमी ,देउता भी आवेइ खातिर रमावे हैं धूनी २ ऐसी धरा को ऐसी धरा को ,ऐसी धरा को देऊगण मस्तक झुकाला | आपन देशवा सारे जग से निराला ,आपन देशवा सारे जग से निराला ||

"परी हो तुम"

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रब ने तुझको जाना ,कुछ ऐसे बनाया है , तुझे देख के यूं लगता तू उसका ही साया है | रब ने तुझको .......................................... मस्ती भरी आँखों में ,हिरनों सी है चंचलता , तेरे मद भरे अधरों से से छलके मधु की सरिता, और सुर्ख कपोलों में पुष्पों सी  है कोमलता , नागिन ने भी लहराना तेरी लटों से पाया है || रब ने तुझको ................................................... जब जब मुस्काती हो तब तब चमकें मोती , तेरा अंग अंग यूं दमके जले तिमिर में ज्यों ज्योती , तेरा रूप देख मोहें साधू सन्यासी  यती , किस्मत वाला वो है जिसने तुझे पाया है || रब ने तुझको .................................................. तुझे प्यार से मैं देखूं या प्यार करूँ तुझको , मिलना तो बड़ा मुश्किल पाऊँगा कहाँ तुझको , तुझे दिल में बसा लूँ पर अफ़सोस है ये मुझको , परियों को धरा पर क्या कभी किसी ने पाया है || रब ने तुझको जाना कुछ ऐसे बनाया है , तुझे देख के यूं लगता तू उसका ही साया है ||

तुम गुलाब हो

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देख जिसको प्यास बढ़ती तुम वो आव हो , मैं सत्य बोलता हूँ प्रिये तुम गुलाब  हो | आँखे कमल की पंखुड़ी,जो नींद मेरी ले उड़ी , तुम अप्सरा या हूर हो लेकिन नहीं मगरूर हो | सौंदर्य की प्रतिमा हो या,हलके नशे का शुरूर हो , चढ़के न जो उतरे सनम ,तुम वो शराब हो | मैं सत्य बोलता ............................................... स्वप्न हो या तुम हकीकत मैं समझ पाया नहीं , देख ली दुनिया मगर ,तुझसा कोई भाया नहीं | रह गया हैरान मैनें जान ली जब बात  यह , प्यार धरती पर फरिस्तों से किया  जाता  नहीं | आसमाँ की परियों से, बढ़कर  जनाब  हो || मैं सत्य बोलता हूँ ............................................. नर्म नाजुक लव हिलें तो, फूल बरसें घर अँगन में , देखकर ऐसा नजारा ,  फूल शर्मायें चमन में | रात में तुम्हे देख छत पर चाँद छुप जाये गगन में, बस चले मेरा अगर तुमको छुपा लूँ निज नयन में | दुनिया के गुलशनों का ,तुम ही शबाव हो || मैं सत्य बोलता हूँ  प्रिये तुम गुलाब हो || 

सौन्दर्य

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रक्ताभ कपोल तेरे   रूपसि,झंकृत करते हैं रोम रोम , बिखरे सुन्दर से केशजाल  मानो घन से ढक रहे व्योम | आपस में बिंधे अधर दोनों     ज्यों गुलाब की दो पंखुड़ियाँ , हिरनों की जिनमें चंचलता ऐसी हैं तेरी अंखडिया काम  की कमान लगे भौंहें  कजरारी पलकें अति सोहें , आनन चन्द्र की तरह चमके जिसे देख ऋषीजन भी मोहें | प्रस्फुटित स्वरों के होने से मन की वीणा झंकार उठे , जैसे बसंत के आने पर वन में कोकिला पुकार उठे  जब चलती हो कटि लहराकर नागिन को भी लज्जा आये  मुझसे ना उपमा कर बैठे अतएव  बिलों में छुप जाये   ||

""हास्यकविता"

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" लीला मंचन"                                             आधुनिक नाटकों का  हाल मैं सुना रहा हूँ, ध्यान देके भ्रात मेरी बात सुन लीजिए । राम और कृष्ण का चरित्र अति पावन था, मंच बाले राम का चरित्र दर्श कीजिए ॥ जर्दा की पुड़िया को देके लक्ष्मण जी को, कहते प्रभु राम भइया जल्दी इसे मीजिए।  भैया लक्ष्मण ने जो सिगरेट सुलगाई , बोले हनुमान एक मुझे भी तो दीजिए॥             २ एक दिन मैं भी रामलीला देखने को गया, देखा दृश्य मंच का तो बुध्दि चकरा रही । लीला बाले मन्च पे ही पहन के न्यून वस्त्र, नर्तकियाँ थीं अश्लील गीत गा रही ॥ पर्दे के पीछे जहाँ सज रहे थे कलाकार,  कुछ ध्वनि वहाँ से थी बाहर को आ रही।  मैने देखा राम जी तो जर्दा मसल रहे , और सीता मैया जी थीं बीड़ी सुलगा रहीं॥             ३ बोले राम उस लड़के से जो था सीता बना, यार एक बीड़ी हमको भी तो पिलाइए ।  बोलीं सीता बन्ड्ल में एक ही...

राँग नम्बर

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                    राँग नम्बर      मेरे मोबाइल पर नये नम्बर से मिश्काल आ रही थी,  जो मुझे तंगकिये जा रही थी, क्लास से निकल कर मैने मिश्डकाल को बापस घुमाया, तो कम्प्यूटर ने मेरा बैलेंस ग्रेस पीरियड में बताया, मैं कुछ सोच ही रह था तभी मोबाइल  फ़िर घनघनाया,काल रिसीव करते ही कोकिल सद्रश नारी स्वर श्रवण रन्ध्रो से टकराया, उसने फ़र्माया आप कहाँ से बोल रहे हैं ,मैं आश्चर्य मिश्रित स्वर में बोला> क्या आप किसी दूसरे ग्रह की प्राणी हैं, क्या आपने अभी तक नहीं जान पाया कि जब से मानव इस धरती पर आया,बेचारा रोजी रोटी की जुगाड में इधर से उधर उधर से इधर डोल रहा है और संसार का प्रत्येक प्राणी अपने मुखारबिन्द से ही बोल रहा है,वो बोली नहीं मेरा मतलब है आप किस स्थान से बोल रहे हैं, मैनें आवाज को गम्भीर बनाकर उत्तर दिया, हमारे इस कान्तियुक्त शरीर को जब ईश्वर ने बनाया तब परमपिता परमेश्वर ने नासिका और ठॊढी के मध्य जिस स्थान को सजाया जिस से रोटी ,दाल सब्जी पानी सबकुछ ढकोल रहे हैं , हे सुन्दरी हम उसी स्थान से बोल रहे ...

गुजरे लम्हे

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                     "गुजरे लम्हे" १  कोई जब दूर होता है तो कितना याद आता है करूँ जब बन्द आँखे उसका चेहरा मुस्कुराता है । जो गुजरे साथ मे लम्हे नहीं दिल भूल पायेगा;  मुझे  रातों की तन्हाई में वो अक्सर सताता है॥                           २   नहीं मैं भूल पाऊँगा नहीं वो भूल पायेगी,    उसे वो प्यार मेरा वो वफ़ायें याद आयेंगी ।    करेगी लाख कोशिश दिल से मेरा प्यार मिट जाये,        भुलाने की मुझे सब कोशिशें नाकाम जायेंगी ॥                                       ३  वफ़ा की तुम हो देवी , कैसे दिल तुमको भुलायेगा , तुम्हारे साथ में गुजरा हर एक पल याद आयेगा। सहे जितने सितम तुमने हमारे वास्ते हमदम, तेरे अहसान मरकर भी कोई कैसे चुकायेगा ॥                 ...

बहुत याद आते हो तुम

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            " बहुत याद आते हो तुम" बहुत याद आते हो तुम, बहुत याद आते हो तुम।२। तुझे एक पल भी भुला मैं ना पाऊँ,                  व्यथा अपने मन की किसे मैं सुनाऊँ, कि कितना रुलाते हो तुम,बहुत याद आते हो तुम ॥ वो कहना तुम्हरा मुझे मत भुलाना,कभी मेरे हमदम न मुझको रुलाना ।              हमारी मुहब्बत न हो जाये रुसवा                                मेरा नाम अपने न होटों  पे लाना । किया तुझसे वादा निभा मैं रहा हूँ,                     तेरा नाम लव तक न मैं ला रहा हूँ। तुम्हे सच बताते हैं हम,बहुत याद आते हो तुम॥ जो रातों की तन्हाई में चाँद देखूँ                      तो अक्सर तुम्हारे ही बारे मे सोचूँ , कभी पास मेरे था एक चाँद मेरा                 ...

"यादें"

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                                        " यादें" जब जब उसकी यादें आने लगतीं हैं,मत पूछो कितना तडपाने लगतीं हैं। मेरे खयालों में जब उसकी दस्तक हो आखें फ़िर पानी बरसाने लगती हैं॥ जब जब उसकी........................ ख्वाव उसे भी रातों को आते होंगे,मुझको भी तो पास कभी पाते होंगे। और हसीं लगती होगी प्यारी सूरत,नींद ही में जब वो मुस्काने लगती है ॥ जब जब उसकी ...................... दिल में मेरा प्यार छुपाकर रखती है,सपनों की एक दुनिया बसाकर रखती है। प्यार से मेरा नाम हथेली पर लिखकर,फ़िर दुनिया के डर से मिटाने लगती है॥ जब जब उसकी.......................... जीवन के पथ पर थे जब हम साथ चले,हाथ में थामे एक दूजे का हाथ चले। तब थीं बहारें अब पतझड का मौसम है,पर यादों की बदली छाने लगती है ॥ जब जब उसकी यादें आने लगती हैं,मत पूछो कितना तडपाने लगती हैं ॥                                         ...

शारदे वन्दना

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स्वरदायिनी वरदायिनी हे मातु वीणावादिनी,                             हे श्वेत अम्बर धारिणी                              हे हंस प्रष्ठ्विहारिणी, तू ही ज्ञान काभण्डार है तू ही देवि प्रज्ञा प्रदायिनी,                                स्वरदायिनी वरदायिनी......................... तव चरण में नत माथ हो ,मेरे शीष पर तेरा हाथ हो,                       मम कण्ठ में तेरी गाथ हो,सुर ताल की स्वर स्वामिनी,  स्वरदायिनी वर....................................... जननी ये सुत तेरा अज्ञ है मेरी मातु तू सर्वज्ञ है,                      जड़ता को मेरी दूर कर ,अज्ञानता की विनाशिनी॥ स्वरदायिनी वरदायिनी हे मा्तु वीणा वादिनी  ...................... अज्ञान का तम दूर क...

मेरे बारे में

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मैं  अनन्तराम मिश्र पुत्र श्री छोटे लाल मिश्र   ग्राम औड़ेरी पोस्ट कैमी तहसील शाहाबाद जनपद हरदोई उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ |  श्री सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्व विद्यालय से मैंने संस्कृत साहित्य में आचार्य तथा हिन्दी एवम सामाजिक विज्ञान एवं कंप्यूटर विषय में बी.एड.किया है । साहित्य में रूचि होने के कारण हास्य और प्रेम को आधार बनाकर इस ब्लाग पर कुछ लिखने का प्रयास कर रहा हूँ |                      मैं         वर्तमान समय में  श्री व्याकरण तत्व प्रकाशिका संस्कृत उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सांडी  जनपद हरदोई विद्यालय में   साहित्याचार्य के  पद पर कार्यरत हूँ । काव्य के क्षेत्र में किसी महान व्यक्तित्व को अपना गुरु बताया था, एकबार किसी छंद में त्रुटि होने पर उनके सम्मान को मेरे द्वारा ठेस पहुंची और उन्होंने सार्वजनिक सभा में और खासकर उन बच्चों के सामने जिनको मैंने भी पढ़ाया कहा की कृपया कविता के क्षेत्र में मुझे कोई भी अपना गुरु न कहें जिसे छंद तक की जानकारी नहीं है...